Thursday, November 2, 2017

आनंदित निर्झर




छम छम बरसे
प्रेमामृत सा
खिला करूण
अलोक अपरिमित
मौन मधुर
झीना झीना सा
सरस सूक्ष्म 
आनंदित निर्झर
तन्मय बेसुध 
लीन.... 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
नवम्बर १ , २०१७ 

Thursday, May 25, 2017

छोड़ कर स्वरुप अपना




उतरती है गंगा
भगीरथ के बुलावे पर
बहती छल छल
करूणा सुन कर तीव्र पुकार
उद्धार की


पीढ़ी दर पीढ़ी
अनुस्यूत
एक भाव
एक सात्विक सातत्य
सहेजता
सम्बन्ध समग्रता से
 खिल  जाता सौंदर्य शाश्वत का

नदी बह रही
अब
छोड़ मर्यादा
तट की

निश्चिंत है
छोड़ कर स्वरुप अपना
आ मिली
सागर में
कभी कभी खो देना ही
होता है
पा लेना सचमुच


बाहें फैला
पकड़ रहा
बादलों को

खिलखिला कर स्वीकारता
पराजय अपनी

हो गया
अंकित
भीगापन
अलौकिक हृदय पर


जुड़ता है
बिना जोड़े
मिले उसे
जो स्वयं को छोड़े
इसी की महिमा
गाये गगन
सुन कर मगन
झूमें पावन
सौंप इसे
तन - मन
पा लिया
 अनंत आंगन

२५ मई २०१७
अशोक व्यास
अरुणाचल आश्रम, न्यूयार्क


मधुर मधुर हो अपना जीवन





उतरती है गंगा
भगीरथ के बुलावे पर
बहती छल छल
करूणा सुन कर तीव्र पुकार
उद्धार की


पीढ़ी दर पीढ़ी
अनुस्यूत
एक भाव
एक सात्विक सातत्य
सहेजता
सम्बन्ध समग्रता से
 खिल  जाता सौंदर्य शाश्वत का

नदी बह रही
अब
छोड़ मर्यादा
तट की

निश्चिंत है
छोड़ कर स्वरुप अपना
आ मिली
सागर में
कभी कभी खो देना ही
होता है
पा लेना सचमुच


बाहें फैला
पकड़ रहा
बादलों को

खिलखिला कर स्वीकारता
पराजय अपनी

हो गया
अंकित
भीगापन
अलौकिक हृदय पर


जुड़ता है
बिना जोड़े
मिले उसे
जो स्वयं को छोड़े
इसी की महिमा
गाये गगन
सुन कर मगन
झूमें पावन
सौंप इसे
तन - मन
पा लिया
 अनंत आंगन

२५ मई २०१७
अशोक व्यास
अरुणाचल आश्रम, न्यूयार्क


चल निश्छल निश्छल निश्छल चल 
तू दीन दुःखी का बन सम्बल 
बन पावन तू, मन भावन तू 
ज्योतिर्मय बन सुखप्रद शीतल 

चल निश्छल निश्छल निश्छल चल 
ो हिमगिरि सूत, तू गंगा जल 
रस प्रेम और आनंद बहा 
संतोष लुटा पथ उन्नत चल 

अशोक व्यास 
मई २०१७ 
न्यूयार्क, अमेरिका 

Friday, March 31, 2017

मंज़िल से दूर















न जाने क्यूँ
हो रहा कुछ ऐसा बार बार
जा नहीं पाता
एक सीमित घेरे के पार

अवसरों से हाथ मिलाता हूँ
फसल नई उगाता हूँ
पर फिर एकाकीपन में
चुप चाप खड़ा हो जाता हूँ

अपेक्षाओं के नए नए तीर चलाता हूँ
निशाने पर खुदको ही खड़ा पाता हूँ
घायल होते जाने होने का दर्द जारी
आंसू छुपा कर फिर फिर मुस्कुराता हूँ

अब मंज़िल से दूर रह रह कर
इस तरह कसमसाता हूँ
 घर से बाहर एक नया कदम
उठाने में घबराता हूँ

न जाने क्यों
हो रहा बार बार
फिसलता जाए है
मुझसे विस्तार
ये जड़ता की मार
ये मूढ़ता का वार
सब लगे  निस्सार
कहो कैसे पाऊं सार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका

Friday, March 24, 2017

कविता की गोद में


एक दिन
जब बढ़ने लगता है
ये अहसास
की हर अनुभव पर
एक 'अंतिम तिथि' लिखी है
जैसे
बाजार से दूध लाओ
तो उसे एक निश्चित तिथि से पहले
प्रयुक्त करने का संकेत अंकित होता है

वैसे ही
हर ख्वाब, हर सपने, हर चिंतन के प्रयोग की
कोई न कोई अंतिम तिथि है

तब
एक बारगी
हड़बड़ी में सब कुछ
जल्दी जल्दी ख़त्म कर लेने की व्यग्रता
और फिर
अपनी अक्षमता
और फिर निष्क्रियता
और फिर नए सिरे से संतुलन की तलाश
चुकते चुकते
चूकने से बचने का
एक और प्रयास

कविता की गोद में
बैठ
अपने आप को लाड लड़ाता हूँ
क्षितिज को थपथपाता हूँ
असीम को साथ खेलने बुलाता हूँ

ये कैसा द्वार खोल देती कविता
 जिसके उस पर
मैं पूरी तरह नया

 निश्छल सौंदर्य को छूकर
हर 'अंतिम तिथि' से परे
क्या शाश्वत हो जाता हूँ?

अब ये सोच कर मुस्कुराता हूँ
की सब कुछ नाप लेने की ज़िद में
मैं स्वयं ही अपने लिए
एक 'अंतिम तिथि' निश्चित करता जाता हूँ

इस पार  रहूँ
तो 'अमिट' हूँ
पर अनजाने में
कविता को झुठलाता हूँ
और
नुकीले प्रश्न उगा कर
उस पार जाता हूँ
लहूलुहान होता जाता हूँ

ये कौन झूला रहा है मुझे
विध्वंस और सृजन के बीच
देखता हूँ
तो देखते देखते
अनंत से आँख मिलाता हूँ

फिर मुस्कुराता हूँ
कविता को कृतज्ञता से देखता
अपने कवि होने पर धन्य हुआ
सबके लिए प्यार लुटाता हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क अमेरिका
२४ मार्च २०१७


















टालता हूँ जीना
दिन दिन
जाने अनजाने
देख कर
अनदेखा कर देता
जाने पहचाने रास्ते

किसी एक दिन की
प्रतीक्षा में
सुरक्षित रखे सपने
न जाने कब
धीरे धीरे
पीले होकर
झड़ने लगते हैं

टालता हूँ जीना
कभी प्रमाद में
कभी अवसाद में
कभी टूटे सपनो
की याद में

और धीरे धीरे
हो लेता हूँ वह मनुष्य
जो मुझे नहीं होना था
जो मैं नहीं हूँ सचमुच

धीरे धीरे
डर और असफलता के बीच
सहानुभूति का कटोरा लिए
निकलता हूँ
जब अपनों के बीच
अनायास
अपरिचित  हो जाते हैं सब
क्योंकि वे मिलते हैं
उस मनुष्य से
जो मैं नहीं हूँ

टालता हूँ जीना
क्यों की भूल जाता हूँ
हूँ कौन मैं ?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ मार्च २०१७ 

Saturday, February 18, 2017

अनमना कवि





















कविता लिखते लिखते
जब उपादेयता का प्रश्न
मचल जाता है
कवि कविता लिखने
से कतराता है


और फूलों की घाटी की और उड़ता
एक काल्पनिक यान
बाज़ार की गलियों की और
मुड़ जाता है
जोड़ गणित के बीच
अनमना कवि
चुपचाप कसमसाता है
पर कवि का मिटना सिमटना
कौन जान पाता है




व्यावहारिक दृष्टि
काव्यदृष्टि से करती है तकरार
कौन लड़े मुक्क़द्दमा इसका
कवि में फकीरी है  बेशुमार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ फरवरी २०१७ 

Friday, February 17, 2017

पिंजरा














 पिंजरा

 पिंजरा खुला हो 
तब भी 
ऐसा होता है साहिबान 
घेरे का पंछी 
निकल कर 
नहीं भरता उड़ान 

सींकचों में घिरे रहना 
उसे  सुरक्षा कवच सा लगता है 
हम ऐसे पंछी जिन्हें 
रिश्तों का रस्सा सच सा लगता है 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१७ फरवरी २०१७ 


Tuesday, January 3, 2017

सार सज्जित आव्हान



जीवन वह नहीं
जो मिला है
जीवन वह है
जो तुम बनाते हो

सच बात है

तुम पैदाइशी निर्माता हो
 अपने भाग्य विधाता हो

तुम ही संकट कारक
तुम ही आनंद प्रदाता हो



तुम वह नहीं
जो दीखते हो
वो नाम नहीं
जो लिखते हो

सच बात है

तुम जन्म से ही विराट हो
काल से परे का ठाट हो

चाहो तो बनो बंदी भी
वैसे तो तुम सम्राट हो


तुम मंगल मुस्कान हो
सांस सूत्र की शान हो
अपने भीतर अनंत का
सार सज्जित आव्हान हो

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ जनवरी २०१७




Thursday, December 29, 2016

बहती धार

नींद लहर 
लहर नींद 
किनारा आँख 
आँख किनारा 
बहती धार 
चेतन से सुप्त अवस्था तक 

लौट लौट 
जाग्रत होने के प्रयास करता 

नींद के लोक से परे लौट कर 
देखता हूँ 
जगता हूँ प्रयत्नपूर्वक 

सोने से कतराता हूँ 
और फिर अकेला अकेला 
मुस्कुराता हूँ 

अशोक व्यास 

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...